Monday, 24 May 2021

UP Bourd Science Questions Pepar 01

UP Bourd Science Questions Pepar
UP Bourd Science Questions Pepar




निर्देश:प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्नपत्र पढ़ने के लए निर्धारित है।
सामान्य निर्देश :  
  1. यह प्रश्नपत्र तीन खण्डा'क' 'ख' 'ग' में विभाजित है।
  2. प्रत्येक खंड का पहला प्रश्न बहुविकल्पीय है जिसमें चार विकल्प दिये गये हैं । सही विकल्प चुनकर अपनी उत्तर पुस्तिका में लिखिए ।
  3. प्रत्येक खण्ड के सभी प्रश्न एक साथ करना आवश्यक है। प्रत्येक खण्ड नए पृष्ठ से प्रारम्भ किया जाये ।
  4. सभी प्रश्न अनिवार्य हैं ।
  5. प्रश्न के निर्धारित अंक उनके सम्मुख दिये गये हैं ।
  6. आवश्यकतानुसार अपने उत्तरों को पुष्टि स्वच्छ एवं नामांकित चित्रों  तथा रासायनिक समीकरणों द्वारा कीजिए ।
खण्ड'क' : भौतिक विज्ञान

1. (क) नीचे दिये रंगों में से कौन सा रंग, प्राथमिक रंग नहीं है:
(1) लाल
(2) नीला
(3) श्वेत
(4) हरा

(ख) आंखों में प्रवेश करने वाली प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करता है :
(1) परितारिका 
(2) पुतली 
(3) श्वेत मण्डल 
(4) सीलियरी पेशियाँ

(ग) 10 ओम तथा 20 ओम के दो प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़ने पर कुल प्रतिरोध होगा : 
 (1) 30 ओम 
(2) 20 ओम 
(3) 3/20 ओम 
(4) 20/3 ओम

(घ) विद्युत-जनित्र स्रोत है :
(1) विद्युत ऊर्जा का
(2) विद्युत आवेश का
(3) यान्त्रिक उर्जा का
(4) इनमें से कोई नहीं

2. (क) प्लेमिंग का बायें हाथ का नियम किस काम आता है?
(ख) 1 किलोवाट घण्टा में कितने जूल होते हैं ?
(ग) तारे क्यों टिमटिमाते हैं?

3. (क) प्रकाश के अपवर्तन के नियम लिखिए ।
अथवा 
एक विद्युत हीटर में 120V विभवान्तर पर 12 कूलॉम का आवेश प्रवाहित होता है। हीटर में कितनी ऊर्जा व्यय होगी ?

(ख) दूरदृष्टि से पीड़ित एक व्यक्ति, न्यूनतम 50 सेण्टीमीटर की दूरी तक ही देख सकता है। सही दृष्टि के लिये आवश्यक लेंस की प्रकृति एवं उसकी फोकस दूरी की गणना कीजिए। सम्बंधित किरण आरेख भी खींचिए । स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी D=25 सेमी।
अथवा
दिष्ट धारा जनित्र एवं प्रत्यावर्ती धारा जनित्र में चार प्रमुख अन्तर लिखिए।

4. एक संयुक्त सूक्ष्मदर्शी के अभिदृश्यक तथा अभिनेत्रक लॅस की फोकस दुरियां क्रमश: 4 मिमी 25 मिमी हैं। यदि वस्तु को अभिदृश्यक लेंस के फोकस बिन्दु से 0.2 मिमी और आगे रखा जाये तो संयुक्त सूक्ष्मदर्शी की सम्पूर्ण आवर्धन क्षमता की गणना कीजिए, जबकि अन्तिम प्रतिबिंब स्पष्ट दृष्टि की अल्पतम दूरी पर बनता है । सम्पूर्ण प्रक्रिया का किरण आरेख भी खींचे।
अथवा
विद्युत प्रेस का नामांकित चित्र बनाकर इसको कार्य-विधि का वर्णन कीजिये।
 

खण्ड'ख' : रसायन विज्ञान

5. (क) नीले थोथे का प्रयोग किया जाता है :
(1) स्याही में 
(2) जैम में 
(3) जेली में 
(4) साबुन में

(ख) एथिलीन गैस हाइड्रोजन से क्रिया करके कौन-सा संतृप्त यौगिक बनाती है :
(1) एथेन 
(2) मेथेन
(3) एसिटिलीन
(4) प्रोपेन

(ग) रक्त का pH होता है:
(1)0
(2)2
(3)4
(4) 7.4


6. (क) योगात्मक अभिक्रिया को परिभाषित कीजिए ।
(ख) CHCH.CH,OH और CHCI, के IUPAC नाम लिखिए ।
(ग) 'विद्युत ऋणात्मकता' क्या है ? समझाइये ।

7. कॉपर की किन्हीं चार मिश्र धातुओं के नाम, उनके संघटन एवं मुख्य उपयोग लिखिए।
अथवा
वियोजन (अपघटन) अभिक्रियाओं को तोड़ने के लिए या तो उष्मा अथवा प्रकाश अथवा विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है । प्रत्येक प्रकार की वियोजन अभिक्रिया जिसमें उष्मा, प्रकाश और विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति की जाती है, के लिए एक-एक रसायनिक समीकरण दीजिए।
अथवा
साबुन के निर्माण में प्रयुक्त दो पदार्थों के नाम व रसायनिक अभिक्रिया लिखिए। 
8. एक उदासीन कार्बनिक यौगिक X जिसका अणुसूत्र CH, है, का अम्लीय पोटेशियम डाइक्रोमेट के साथ ऑक्सीकरण कराने पर एक अम्लीय यौगिक Y देता है । यौगिक X और Y सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में परस्पर क्रिया करके एक मीठी गन्ध वाला यौगिक z देते हैं। XYZ क्या है ? 
अथवा
धातुओं के भौतिक एवं रासायनिक गुणों की विवेचना कीजिए ।

खण्ड'ग' : जीव विज्ञान

9. (क) वह अन्तःस्रावी ग्रन्थि जो मनुष्य के मस्तिष्क में पायी जाती है :
(i) थायराइड 
(ii) अधिवृक्क 
(iii) थायमस 
(iv) पीयूष ग्रन्थि

(ख) घ्राण पिण्ड किसका बोध कराते हैं :
(i) बुद्धि 
(ii) स्वाद 
(iii) गन्ध
(iv) विचार

(ग) जीवधारियों में वही गुण वंशानुगत होते हैं जो प्रभाव डालते हैं :
(i) हृदय पर
(ii) दैहिक कोशिकाओं पर
(iii) मस्तिष्क कोशिकाओं पर 
(iv) जनन कोशिकाओं पर

(घ) ऐच्छिक किस्म का पौधा प्राप्त करने के लिए उपयुक्त विधि है : 1
(i) कलम 
(i) रोपड़
(iii) दाब 
(iv) कोई भी

10. (क) अग्न्याशय से स्रावित होने वाले हारमोन का नाम तथा इसके एक कार्य का उल्लेख कीजिए।
(ख) उस तत्त्व के नाम का उल्लेख कीजिए जो अस्थियों में मुख्य संघटक के रूप में उपस्थित रहता है ।
(ग) गैस्ट्राइटिस क्या है ? किस नशीले पदार्थ के सेवन से यह रोग होता है ?

11. (क) हीमोग्लोबिन से आपका क्या आशय है ? रुधिर परिसंचरण में इसकी भूमिका का वर्णन कीजिए।
अथवा
एन्जाइम्स तथा हारमोन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

(ख) जनसंख्या वृद्धि के कारण, हानियाँ तथा नियन्त्रण के विभिन्न उपायों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
प्रारूपिक कशेरुका का नामांकित चित्र बनाकर उसके विभिन्न भागों का वर्णन कीजिए।

12. संवेदनग्राही से आप क्या समझते हैं ? मनुष्य में संवेदांग कितने प्रकार के होते हैं ? मानव की त्वचा का अनुलम्ब काट का नामांकित चित्र बनाकर इसमें उपस्थित संवेदी देहाणुओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव हृदय की बाह्य संरचना का नामांकित चित्र बनाइए तथा दोहरे रक्त परिसंचरण का महत्त्व समझाइए ।



Friday, 21 May 2021

लैंगिंक का समाजीकरण (Gender Socialization)

समाजीकरण ऐसी प्रक्रिया है जो नवजात शिशु को सामाजिक प्राणी बनाती है। इस प्रक्रिया के अभाव में व्यक्ति सामाजिक प्राणी नहीं बन सकता। इसी से सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है। सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के तत्वों का परिचय भी इससे ही प्राप्त होता है।
लिंग का समाजीकरण (Gender Socialization)


समाजीकरण ऐसी प्रक्रिया है जो नवजात शिशु को सामाजिक प्राणी बनाती है। इस प्रक्रिया के अभाव में व्यक्ति सामाजिक प्राणी नहीं बन सकता। इसी से सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है। सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के तत्वों का परिचय भी इससे ही प्राप्त होता है।

समाजीकरण से न केवल मानव जीवन का प्रभाव अखण्ड व सतत रहता है, अपितु इसी से मानवोचित गुणों का विकास होता है और व्यक्ति सुसभ्य व सुसंस्कृत बनता है। समाजशास्त्रियों, समाज-मनोवैज्ञानिकों,मानवशास्त्रियों तथा शिक्षाशास्त्रियों द्वारा समाजीकरण शब्द का प्रयोग उस प्रक्रिया के लिए किया जाता है जिसके द्वारा आदर्शो, प्रथाओं एवं विचारधाराओं का आन्तरीकरण होता है। इसी के माध्यम से व्यक्ति में वे क्षमताएँ एवं आदतें विकसित होती हैं जो समाज में रहने के लिए अनिवार्थ मानी जाती हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से प्रत्येक समाज अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक निरन्तरता को बनाए रखता है। समाज के मूल्यों एवं आदर्शों का आन्तरीकरण भी

सीख की इसी प्रक्रिया के माध्यम से होता है सीखने की यही प्रक्रिया समाजशास्त्र में समाजीकरण कही जाती है।यहाँ जेण्डर विकास की प्रक्रिया में समाजीकरण की प्रकृति को समझाने का प्रयास किया जाएगा -

(1) समाजीकरण की प्रकृति और जेण्डर - परिवार में एक बच्चे के साथ उसके लिंगानुसार अलग-अलग व्यवहार किया जाता है, क्योंकि परिवार में ही बच्चों को सर्वप्रथम अपने जेण्डर के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है। उसके जेण्डर के आधार पर ही उसका विकास किया जाता है और उसे उसी प्रकार के खिलौने, कपड़े आदि प्रदान किए जाते हैं। इस प्रकार से माता-पिता द्वारा बचपन से ही यह अवधारणा बालक के हृदय में उत्पन्न कर दी जाती है कि जीवन में उसकी किस प्रकार की भूमिका होगी, क्योंकि हमारे पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुषों का समाजीकरण बिल्कुल अलग ढंग से किया जाता है। पुरुषों से यह आशा की जाती है कि उनमें पुरुषोचित गुण पूरी तरह से विकसित हो, जैसे स्वतन्त्रता, आत्मनिर्भरता, प्रभावी सक्रियता, सांसारिकता, निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व का गुण, स्वावलंबन, तार्किकता, प्रतियोगिता आदि। इसका कारण यह है कि इन गुणों से युक्त पुरुषों पर भी समाज गर्व करता है तथा किसी नारी में यह गुण उत्पन्न होने पर समाज द्वारा पौरुषीय गुण वाली स्त्री बताकर उसमें परिवर्तन लाने के लिए समाज दबाव बनाता है।


(2) परिवार में निजी एवं सार्वजनिक द्विविभाजन - आधुनिक समाज में निजी एवं सार्वजनिक रूप से भी जेण्डर के आधार पर द्विविभाजन पाया जाता है। आजकल के समाज में महिलाओं एवं पुरुषों दोनों में प्रत्येक क्षेत्र में, जैसे - कार्य क्षेत्र, कार्य के वेतन, निर्णय क्षमता, नेतृत्व की क्षमता आदि सभी में भेदभाव किया जाता है। प्रत्येक समाज में महिलाओं के लिए अलग से व्यवहार प्रतिमानों की रचना की गई है। इसलिए उनसे यह आशा की जाती है कि वे घर की चारदीवारी में रहकर परिवार के और उसके सदस्यों के विकास में ही अपना जीवन समर्पित कर दें।

इस प्रकार स्त्रियों में स्वतन्त्र विचार करने की क्षमता का विकास ही नहीं होने दिया जाता। नारी को स्वयं के विकास के लिए कुछ भी समय निकालो की प्रेरणा न देकर उनको अपना जीवन परिवार के विकास में लगाने की ही प्रेरणा परिवार व समाज द्वारा दी जाती है। जबकि पुरुषों से आशा की जाती है कि वे घर से बाहर निकलकर अपना और समाज का विकास करें। इस प्रकार यदि देखा जाए तो सभी सामाजिक बन्धन, रीति-रिवाज रूढ़ियाँ आदि केवल महिलाओं के लिए ही हैं। हमारे पुरुष प्रधान समाज में पुरुष वर्ग पूरी तरह से आज स्वच्छन्द जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है।

(3) परिवार में जेण्डर भूमिका - समाज में नर-नारी के समाजीकरण का एक आधार यह भी है कि पुरुष बच्चों के लालन-पालन की कोई भी जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेते हैं। परिवार में बच्चे के लालन-पालन की पूर्ण जिम्मेदारी महिला को ही सौंप दी जाती है। यह भी कहा गया है कि एक बच्चे को समाज के अनुरूप बनाने में महिला की महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि महिला ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अपने गुणों को स्थानांतरित करती है। समाज में एक बालक का समाजीकरण करने में वस्तुतः माँ की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका है और माँ ही बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है, क्योंकि बालक को समाज के मानदण्डों का पालन करने की और उन बातों को नहीं करने की जो समाज के प्रतिकूल है, शिक्षा परिवार में केवल माँ ही देती है।

(4) समाजीकरण की दृष्टि से नारी की भूमिका - हिन्दू परिवारों में महिलाओं को न तो किसी प्रकार का कोई निर्णय लेने का अधिकार दिया जाता है और न ही घर की चारदीवारी के बाहर ही क्रियाओं में किसी प्रकार से भाग लेने का अधिकार ही उन्हें दिया जाता है। यही नहीं महिलाओं से आशा की जाती है कि वे अपने अधिक से अधिक समय को गृहकार्य में ही व्यतीत करें। समाज उनके व्यवहार में कुछ ऐसे गुणों की आशा करता है कि महिलाओं में सहनशीलता, समर्पण, परोपकारिता आदि जैसे गुण अवश्य होने चाहिए।

(5) समाज में स्तरीकरण - समाज में स्तरीकृत एवं सोपानीकृत व्यवस्था का प्रचलन रहा है, क्योंकि कोई भी समाज चाहे वह आदिम समाज हो या चाहे आधुनिक समाज हो, इसकी व्यवस्था के अपवाद नहीं है। स्तरीकृत समाज के आधार भी हमेशा समान नहीं रहे हैं, क्योंकि यह हमेशा इस आधार पर अवलम्बित रहे हैं कि किसी समाज के प्राथमिक मूल्य क्या है ? स्तरीकरण की इस प्रक्रिया ने ही हमारे समाज को वर्ग, जाति आदि घटकों में सीमित कर दिया है। इसीलिए समाज में अनेक स्तरों की रचना हुई है। इस सामाजिक स्तरीकरण में भी महिलाओं को पुरुषों से अलग काही स्तर दिया गया है। अतः जेण्डर के आधार पर समाज में नारी की भूमिकाएं भी अलग-अलग निर्धारित की गई हैं, जिनके माध्यम से नारी की प्रस्थिति, भूमिका, पहचान, सोच, मूल्य एवं अपेक्षाओं को मानसिक रूप से गढ़ा है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि समाजीकरण पर भी जेण्डर का बहुत अधिक प्रभाव है,क्योंकि एक पुरुष का समाजीकरण इस प्रकार से होता है कि वह स्वयं जागरुक बने तथा स्वयं के विकास के विषय में अधिक से अधिक सोचे, जबकि स्त्री का समाजीकरण इस प्रकार से किया जाता है कि उसके परिवार के सदस्यों की उन्नति में ही उसकी भी उन्नति है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि समाज में विद्यमान इस प्रकार के द्विविभाजन को कम किया जाए और महिलाओं को भी पुरुषों के समान आगे बढ़ने और देश एवं समाज के लिए कुछ करने के अवसर दिए जाने चाहिए ताकि समाज में महिलाओं को भी सशक्त भूमिका निभा सकने योग्य बनने की समुचित प्रेरणा दी जा सके।




Thursday, 20 May 2021

समाजीकरण के अभिकरण (Agencies of Socialization In Hindi)

 

समाजीकरण के अभिकरण (Agencies of Socialization In Hindi)
समाजीकरण के अभिकरण (Agencies of Socialization In Hindi)


समाज की विभिन्न संस्थाएँ व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देती आयी हैं। ये संस्थाऐं अथवा अभिकरण  निम्न हैं 

परिवार (Family) - बालक का समाजीकरण करने वाली प्रथम तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था परिवार है। परिवार में ही बच्चे का जन्म होता है तथा सबसे पहले वह माता-पिता व अन्य परिवारजनों के ही सम्पर्क में आता है। परिवार के सदस्य बालक के समाजीकरण में अपना प्रथम तथा स्थायी योगदान प्रदान करते हैं। परिवार के सभी सदस्यों के परस्पर सहयोग और प्रेम-भाव से चलना बालक को समाजीकरण के लिए प्रेरित करता है।

किम्बल यंग (Kimball Young) के शब्दों में
“समाज के अन्दर समाजीकरण की भिन्न-भिन्न संस्थाओं में परिवार अत्यधिक महत्वपूर्ण है।" प्रत्येक बालक अपने माता-पिता से रीति-रिवाज, सामाजिक परम्पराओं तथा सामाजिक शिष्टाचार का ज्ञान प्राप्त करता है। वह परिवार में ही रहकर आज्ञाकारिता, सामाजिक अनुकूलन तथा सहनशीलता की प्रवृत्ति को विकसित करता है। शायद इसीलिये परिवार को बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा गया है, जो कि ठीक भी है।समाजीकरण में परिवार के महत्व को इस प्रकार से समझा जा सकता है -

(क) माता-पिता के व्यवहार का प्रभाव - बच्चों के साथ माता-पिता का क्या और कैसा व्यवहार है, इस बात से ही बच्चे के सामाजिक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। माता पिता के व्यवहार का बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अधिक लाड़-प्यार से पला बालक प्रायः बिगड़ जाता है। इसके साथ ही माता-पिता से प्यार न मिलने पर बालक में हीनभावना ग्रन्थियाँ बनने लगती हैं और उसका व्यक्तित्व ठीक प्रकार से विकसित नहीं हो पाता।

(ख) भाई-बहनों का प्रभाव - परिवार में रहने वाले भाई-बहनों का भी बालक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भाई-बहनों में बालक का जो स्थान होता है उससे बालक का व्यक्तित्व प्रभावित होता है। यदि उसका स्थान परिवार में सबसे प्रथम है तो वह अपने आचरण को सन्तुलित रखने का प्रयास करता है ताकि उसके छोटे भाई-बहन उसका सम्मान करें। एक पीढ़ी के होने के कारण भाई-बहन का प्रभाव समाजीकरण में अत्यधिक पड़ता है।
(ग) माता-पिता के चरित्र का प्रभाव समाजीकरण में माता-पिता के चरित्र का विशेष प्रभाव पड़ता है। चरित्रहीन माता पिता के बालकों के व्यक्तित्व के सन्तुलित होने की कोई सम्भावना नहीं होती। जुआरी, शराबी माता-पिता की संतान नियन्त्रणहीन हो जाती है और वह समाज विरोधी कार्य करने लगती है। इसके विपरीत, चरित्रवान माता-पिता की सन्तान पर रीतिरिवाजों और प्रतिमानों द्वारा सामाजिक नियन्त्रण की सम्भावना बनी रहती है।

(घ) परिवार की आर्थिक स्थिति का प्रभाव - परिवार की आर्थिक स्थिति भी बच्चे के समाजीकरण को प्रभावित करती है। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है, तो बच्चे की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कर दी जाती है जिससे बच्चा अपराधों की ओर आकर्षित नहीं होता। इसके विपरीत, निर्धन परिवार के बच्चों की अवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती। इन परिवारों के बच्चों में हीन-भावना ग्रंथियों का निर्माण हो जाता है और वे समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं।

(ङ) पारिवारिक नियन्त्रण पर प्रभाव - माता-पिता के नियन्त्रण का भी बच्चों अथवा परिवार के युवक-युवतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नियन्त्रणहीन परिवार में युवक युवतियों के बिगड़ने की सम्भावना बनी रहती है। इसके विपरीत, जो परिवार नियन्त्रित रहते हैं उनके बच्चे पूर्णरूप से सुयोग्य एवं नियन्त्रित रहते हैं।

(च) नागरिक गुणों की पाठशाला - परिवार को ही नागरिक गुणों की प्रथम पाठशाला कहा गया है। परिवार में रहकर ही बच्चा सर्वप्रथम सहानुभूति,प्रेम,त्याग, सहिष्णुता, आज्ञापालन आदि गुणों को सीख जाता है,इन्हीं से व्यक्ति का समाजीकरण सम्भव होता है।

(2) पड़ोस (Neighbourhood) - परिवार के पश्चात बालक अपने पड़ौस के सम्पर्क में आता है। पड़ोस के वातावरण से बालक पर्याप्त प्रभावित होता है। पड़ोसियों का परस्पर प्रेम,सहयोग तथा सद्भाव बालक के समाजीकरण में विशेष योग प्रदान करता है। पड़ोस के बालक परस्पर खेलते हैं। इस खेल में या तो बालक अन्य बालकों का नेतृत्व करता है या किसी बालक के नेतृत्व में कार्य करता है। इस प्रकार बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अच्छे पड़ोस में रहना पसन्द किया जाता है।यदि पड़ोस अच्छा नहीं है तो बच्चों के समाजीकरण की प्रक्रिया भी अच्छी नहीं होती है।
(3) शिक्षा-संस्थाएँ (Educational Institutions) - पड़ौस के पश्चात् बालक विद्यालय के समाजीकरण में योगदान प्रदान करता है। विद्यालय समाज का लघु रूप होता है। विद्यालय के समाजीकरण में योगदान प्रदान करता है। विद्यालय समाज का लघु रूप होता है। अतः बालक को वहां अनेक सामाजिक अनुभव होते है और अनेक सामाजिक क्रियाओं भाग लेने के अवसर मिलते हैं। बालक के परस्पर मिलने-जुलने, उठने-बैठने, खेलने-कूदने तथा सहयोगपूर्वक श्रमदान आदि में भाग लेने से उसमें सामाजिकता की भावना का विकास होता है। समाज के नियमों और व्यवहारों का प्रायोगिक ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से विद्यालय का सर्वोच्च स्थान है। यह समाजीकरण का महत्वपूर्ण औपचारिक अभिकरण है। विद्यालय के महत्व को निम्न बातों से समझा जा सकता है -

(क) शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रभाव - बालक के जीवन पर उसके अध्यापकों तथा गुरुओं के व्यक्तित्व और चरित्र का गहरा प्रभाव पड़ता है। अध्यापक के आदर्श, बच्चों के जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। बच्चों के सोचने-विचारने, उठने-बैठने, बोलने तथा हाव-भाव आदि पर अध्यापकों के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव दोनों ही प्रकार का हो सकता है। सुयोग्य अध्यापक, बालकों में लोकप्रिय होकर अपना आदर्श बच्चों के अनुभव के लिए छोड़ जाते हैं। इसके विपरीत, कुछ अध्यापक अपने प्रति घृणा के भाव भी बच्चों के मन में छोड़ जाते हैं।

(ख)स्कूल के वातावरण का प्रभाव - स्कूल का वातावरण भी बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। यदि स्कूलों में अनुशासन ठीक है और सभी अध्यापक अपने उत्तरदायित्व का पूरा ध्यान रखते हैं तो बच्चों का जीवन भी सुधरता है और उनमें जीवन को अनुशासित एवं सन्तुलित करने की क्षमता विकसित होती है। यदि स्कूल का वातावरण दूषित हो तो इसके प्रभाव के कारण बच्चों के व्यक्तित्व का ठीक प्रकार से विकास नहीं हो पाता।

(ग) अध्यापकों के व्यवहार का प्रभाव - अध्यापकों के व्यवहार का भी बच्चों के चरित्र एवं व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव पड़ता है। बच्चों के साथ यदि अध्यापकों का व्यवहार उचित हो तो बच्चे मन लगाकर कार्य करते हैं। इसके विपरीत, यदि बच्चों के साथ कठोर व्यवहार हो तो वे कक्षा भवन से मन चुराने लगते हैं तथा विद्यालय के समय को बुरी संगति में बिताकर छुट्टी के समय घर पहुंच जाते है।इस प्रकार कुसंगति में पड़कर वे समाज विरोधी कार्य करने लगते है और उनके समाजिकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ती है।

(घ) सहपाठियों का प्रभाव - बच्चों के व्यक्तित्व पर उनके सहपाठियों का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि सभी छात्र योग्य परिवार के हों तो बालक की आदतों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। और यदि छात्रों की अधिकतर संख्या टूटे हुए परिवारों से सम्बन्धित है तो बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(4) मित्र-मण्डली - अपनी मित्र-मण्डली में रहना प्रत्येक बालक पसन्द करता है। मित्र-मण्डली एक ऐसा प्राथमिक समूह है जिसमें बालक अनेक बातें सीखता है। मित्रों का परस्पर व्यवहार तथा शिष्टाचार भी समाजीकरण में सहायक होता है। बच्चा अपने मित्रों से काफी कुछ सीखता है क्योंकि एक ही आयु-समूह होने के कारण बच्चे एक-दूसरे को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। परन्तु बुरी मित्र-मण्डली का प्रभाव बालक को असामाजिक बना देता है। परिवार के बाद मित्र-मण्डली ही एक ऐसा प्राथमिक अभिकरण है जिसकी बच्चे के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका है।

(5) जाति (Caste) - 'जाति' से भी व्यक्ति का समाजीकरण होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के प्रति श्रद्धा की भावना रखता है और उसके प्रति कर्तव्य का पालन करना सीखता है। प्रत्येक जाति को अपनी प्रथाएँ, परम्पराएं और सांस्कृतिक उपलब्धियाँ होती हैं। व्यक्ति इनको किसी न किसी रूप में ग्रहण करता है। जाति के नियम पालन, उसके अनुशासन में रहना आदि व्यक्ति के समाजीकरण में योगदान देते हैं।

(6) कीड़ा-समूह (Play group) - मित्र-मण्डली के समान बालक के समाजीकरण में क्रीडा-समूह भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देने हैं। बड़े होने पर बालक अपने साथी-समूह में खेलता है तो वह अपने परिवारों से आये बालकों के सम्पर्क में आता है और उनके बोल-चाल तथा शिष्टाचार के ढंगो को सीखता है। प्रत्येक बतक एक दूसरे को कुछ-न-कुछ सामाजिक व्यवहार के पाठ का शिक्षण देता है। क्रीड़ा-समूह बालकों में समाजिक अनुशासन भी उत्पन्न करता हैं। क्रीड़ा-समूह में रहकर बालक सहयोग, न्याय, अनुकूलन तथा प्रतिस्पर्धा आदि सामाजिक गुणों को अर्जित करता है तथा ये गुणा क्रमशः विकसित होकर जीवन भर काम आते हैं।

(7) विवाह (Maringe) व्यक्ति के पूर्ण समाजीकरण के लिये यौन सम्बन्धों की स्थापना एवं उनका नियमन भी बहुत आवश्यक है। सभ्य समाजों में यौन सम्बन्ध स्थापित करने की समुचित व्यवस्था के लिए विवाह नामक सामाजिक संस्था का प्रावधान है। विवाह द्वारा सामंजस्य की प्रक्रिया चलती रहती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि विवाह भी व्यक्ति के समाजीकरण की एक महत्वपूर्ण संस्था है।

(8) अन्य संस्थाएँ (Other Institutions) - व्यक्ति के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली अन्य संस्थाओं को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(अ) अनिवार्य संस्थाएँ (Compulsory Institutions) - इसके अन्तर्गत ऐसी संस्थाएँ आती हैं जिनमें व्यक्ति को अनैच्छिक रूप से प्रवेश करना पड़ता है। कुछ ऐसी प्रमुख संस्थाएँ निम्न हैं-
(1) धार्मिक संस्थाएँ (Religious Institutions) - व्यक्ति का धर्म से परिचय उस आयु में ही करा दिया जाता है जब वह धर्म को समझता भी नहीं है। धार्मिक संस्थाओं से व्यक्ति में नैतिकता, सच्चरित्रता, पवित्रता, कर्म-परायणता, त्याग व बलिदान और शान्ति तथा न्याय के प्रति अनुराग विकसित होता है। दूसरे के प्रति सहिष्णुता व सभी प्राणी समान है इस तरह के विचारों को बच्चा इन्हीं संस्थाओं से ग्रहण करता है। धर्म व्यक्ति को उचित और अनुचित का ज्ञान देता है। इस प्रकार धर्म के द्वारा मनुष्य के समीकरण में सबसे बड़ी सहायता मिलती है।

(2) आर्थिक संस्थाएँ (Economic Institutions) - आर्थिक संस्थाओं का सम्बन्ध मुख्यतः मनुष्य के जीविकोपार्जन से होता है इन संस्थाओं के माध्यम से व्यक्ति परिश्रम, प्रतिस्पर्धा, उद्देश्यपूर्णता, सहयोग व भविष्य की चिंता आदि परमावश्यक गुणों की प्राप्ति करता है।आर्थिक संस्थाएं, व्यक्ति को विभिन्न व्यवसायों तथा व्यापारिक संघों में बाँटती हैं। इनका प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर निरन्तर पड़ता रहता है।


(3) राजनीतिक संस्थाएँ (Political Institutions) - व्यक्ति ज्यों-ज्यों अपने जीवन की अनेक समस्याओं से जूझता है त्यों-त्यों उसके जीवन में राजनीतिक संस्थाओं का प्रवेश होता है। इन संस्थाओं के द्वारा वह अपने वास्तविक विचारों का निर्माण करता है। राजनीतिक संस्थाएं व्यक्ति को शासन, कनून, अधिकार, कर्तव्य व अनुशासन से परिचित कराती हैं। राजनीतिक प्रशासन का प्रकार तथा व्यक्ति को मिली स्वतत्रता भी उसके व्यक्तित्व को काफी सीमा तक प्रभावित करती है। व्यक्ति विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधाराओं में से किसी एक विचारधारा का (जिसे वह अपने विचारों के अधिक नजदीक समझता है) समर्थन करना शुरू कर देता है। साथ ही, नेताओं का अनुकरण करके तथा चुनाव इत्यादि राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेकर व्यक्ति काफी कुछ सीखता है।


(ब) ऐच्छिक संस्थाएँ (Optional Institutions) - इसके अन्तर्गत ऐसी संस्थाएँ आती हैं जिनमें व्यक्ति का प्रवेश स्वाभाविक रूप से नहीं होता वरन् वह अपनी इच्छा अथवा अन्य व्यक्तियों के आग्रह पर ऐसी संस्थाओं के सम्पर्क में आना है जिनका निर्माण व्यक्तियों द्वारा अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन और पूर्ति के लिए स्ययं किया जाता है। इनसे व्यक्ति का समाजीकरण और अधिक पुष्ट तथा विस्तृत होता जाता है। ऐच्छिक संस्थाएं हमें प्रथा,परम्परा, आचार-विचार के ढंग, व्यवहार के तौर तरीके, आपसी संगठन व किसी त्रुटिपूर्ण परम्परा अथवा विचार का संगठित विरोध करना सिखाती हैं।

ऐच्छिक संस्थाओं में विवाह का प्रमुख स्थान है। कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि विवाह व्यक्ति के समाजीकरण को काफी हद तक पूर्णता की प्राप्ति कराने वाला माध्यम है। इसके कारण व्यक्ति में इतने उच्च सामाजिक मूल्यों का सामवेश होता है कि वह पूर्ण व्यक्तित्व को प्राप्त करता है और समाज को नई इकाइयाँ प्रदान करता है। विवाह के द्वारा वह उत्तरदायित्व, धैर्य, त्याग,पारिवारिक कल्याण, परोपकार और दूरदर्शिता के पाठ ग्रहण करता है।
उपर्युक्त अभिकरणों के अतिरिक्त धार्मिक संस्थाएं, आर्थिक संस्थाएँ एवं राजनीतिक संस्थाएं समाजीकरण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

Wednesday, 19 May 2021

Gender Differences Theory In Hindi(लिंग-अंतर सिद्धांत)

Gender Differences Theory In Hindi(लिंग-अंतर सिद्धांत)
Gender Differences Theory In Hindi(लिंग-अंतर सिद्धांत)


समाजीकरण सिद्धान्तकार (Socialization theorists) लड़कियों के लड़कों से अन्तर या अलग होने की समस्या मानते हैं, तथा समझते हैं कि इसे खत्म किया जाना आवश्यक हैं वहीं लिंग अन्तर सिद्धान्तकार (Gender-difference theorists) विश्वास करते हैं कि स्त्रीत्व के गुणों (female/feminine traits) को पहचाना जाना चाहिये तथा महत्त्व प्रदान किया जाना चाहिए। लड़कियों को लड़कों की तरह से सामाजीकरण करने के बजाए लड़कियों से संबंधित गुणों को पुर्नप्रतिष्ठित (revalorize) करने पर अन्तर सिद्धान्तकार जोर देते हैं। वे देखते हैं कि लड़कियों की शिक्षा से सम्बन्धित समस्यायें अधिकतर स्कूल की संस्कृति तथा स्त्रीत्व को संस्कृति के मध्य असामंजस्य होने से होती हैं। इन सम्बन्धित मूल्यों को सर्वाजनिक क्षेत्र (public sphere) से जुड़ी प्रवृत्तियों जैसे - तार्किकता, प्रतिस्पर्धा, विजय, उपभोक्तावाद तथा रेडिकल व्यक्तिवाद के द्वारा ठेस पहुँचाई जाती है, क्योंकि ये सिद्धान्तकार मानते हैं कि लड़कियों से सम्बन्धित ज्ञान (relational knwoledge) उनकी स्वास्थ्य तथा मानसिक कुशल क्षेम (well-being) के लिए बहुत जरूरी है तथा उनके अनुसार 'स्कूल' ऐसा स्थान होने चाहिये जहाँ लड़कियाँ अपने तरीके से दुनिया को जान सकें। उनका तर्क है लड़कियों को 'जेन्डर निरपेक्ष (gender-netural) नहीं 'बलिक' 'जेन्डर-संवेदी (gender sensitive) शिक्षा की आवश्यकता है।

हालांकि जेन्डर-अन्तर सिद्धांतकारों में जेन्डर-संवेदी शिक्षा क्या हैं? व कैसे दी जायें? इस पर मतैक्य नहीं हैं। कुछ के अनुसार महिलाओं के ज्ञान हासिल करने के तरीके' (Women's ways of knowing) पुरुषों के ज्ञान हासिल करने के तरीकों से न निम्न है और न ही उच्च। अक्सर स्त्री व पुरुष समान निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये भिन्न-भिन्न तरीके अपनाते हैं। इन अलग-अलग अधिगम के तरीकों (approaches) को कक्षा में शामिल किया जाना चाहिये।

दूसरे सिद्धांतकार जिनमें गिलिगन तथा उनके साथी सम्मिलित हैं वे मानते हैं कि मुख्य बिन्दु, लड़कियों के सीखने के तरीके (learning styles) से सम्बन्धित न होकर, वे स्वयं के बारे में तथा जो ज्ञान वे निर्मित करती हैं, उसके बारे में उनके विश्वास से सम्बन्धित है अर्थात् लड़कियां जब भी कुछ अभिव्यक्त करती हैं या सीखती हैं तो वे दूरी की नाराजगी, नापसंदगी या पसंदगी से प्रभावित रहती हैं तथा इस प्रकार वे दूसरों की नजरों में अच्छी' (nice) बने रहने का दबाब झेलती हैं तथा आत्मविश्वास खो बैठती है। इस प्रकार यह सिद्धांतकार महसूस करते हैं कि लड़कियों की समस्या पाठ्यक्रमीय (curricular) न होकर अन्तर सम्बन्धित (Interpersonal)अधिक होती है। अतः लड़कियों में स्वयं के बारे में आत्मविश्वास भरने के लिये महिला रोल मॉडल का होना बहुत जरूरी हो जाता है।

कैरोल गिलिगन ने अपनी पुस्तक (In a diffkerent voice) 'इन ए डिफरेंट वायस' में उल्लेख किया है कि चूंकि महिलायें, प्रकृति के नजदीक होती हैं तथा दुलार, पालन-पोषण और संवेदनशीलता के संदर्भ में प्रकृति के गुणों की वाहक हैं, अतः नारीवादियों को इन गुणों को स्वीकार करके इन्हें प्रतिष्ठा देनी चाहिये। उन्होंने एक मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुये तर्क दिया कि प्रारंभिक दुलार देने वाली इकाई एक स्त्री (मां) ही होती है इसलिये स्त्री व पुरुष जिस प्रक्रिया से होकर वयस्कता तक पहुँचते हैं वह भित्र होती है। लड़के वयस्कता की तरफ बढ़ते हुये अपनी माँ से भिन्नता की दिशा में विकसित होते है, जबकि लड़कियां अपनी पहचान, अपनी माँ के संदर्भ में ही देखती हैं। गिलिगिन का तर्क है इसका नजीता यह होता है किदुनिया के साथ स्त्रियों का जुड़ने का तरीका ज्यादा मनोगत, भावनात्मक तथा संबपरक(relational) होता है जबकि पुरुषों का तरीका ज्यादा वस्तु परक या भौतिक, होता है। क्योंकि वयस्क होते हुए लड़के महसूस करते हैं कि वे माँ से 'भिन्न' है जबकि लड़कियाँ महसूस करती हैं कि वे 'वैसी' ही हैं जैसी माँ। स्त्रियाँ दूसरों के साथ संबंधों में स्वयं देखती हैं जबकि पुरुष स्वयं को अलग देखते हैं। उदाहरण स्वरूप, पुरुष व स्त्री मित्रताओं के स्वरूप में भिन्नता को इस तथ्य के आधार पर समझा जा सकता है।

वे आगे कहती हैं कि स्त्रियों व पुरुषों द्वारा नैतिक निर्णय लेने के तरीकों में भी इसलिये फर्क होता है। उसका निष्कर्ष है कि महिलायें सही व गलत के तार्किक कारणों से उतना प्रभावित नहीं होती जितना वह प्यार, सहानुभूति, चिंता या संवेदनशीलता जैसे कारकों से होती हैं। दूसरी तरफ, पुरुषों का नैतिक निर्णय लेने का तरीका इस बात पर आधारित होता है कि समाज किये सही और किसे गलत मानता है। इसी आधार पर गिलिमन कहती हैं कि तार्किकता, रवायत्तता व न्याय में पुरुष दृष्टि (masculine) से प्राप्त किये गये अनुभवों से ही निकले हुये मूल्य है तथा यहाँ नारी के अनुभव अदृश्य हैं तथा इस फर्क को यदि कोई नहीं चिन्हित करता है, या मानता है तो इसका अर्थ है पितृसत्ता की मान्यताओं को मान लेना कि स्त्रीत्व (feministic values)मूल्यहीन है।

नेल नाडिंग्स (Ne! Noddings) तथा जेन रोलान्ड मार्टिन (Jane Roalnd Martin) का मानना है कि लड़के एवं लड़कियों की स्कूलिंग में हमें अधिक संवेदनाओं, अभिवृतियों तथा संबंधों को महत्त्व देना चाहिये जिससे एक देखभाल की प्रवृत्ति (caring orientation)) को बढ़ावा मिलता है तथा वे इस प्रवृत्ति (caring) को केवल लड़कियों तक सीमित न रख के पूरे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि यदि दोनों लिंग के बच्चों को संबंधपरक (relational) दृष्टिकोण से बड़ा किया जाये तो ऐसे में पारंपरिक पाठ्यक्रम जिसमें वस्तुपरकता तथा सूक्ष्म ज्ञान (objectivity & abstractness) पर बल दिया जाता है इसका स्थान कहने को स्त्रीत्व (feminine) आधारित पाठ्यक्रम ले लेगा जो समाज के भले के लिये ही होगा। इस प्रकार स्कूलों को एक 'तर्क-आधारित, अनुशासित पाठ्यक्रम  के स्थान पर "देखभाल के केन्द्र'' (centres of caring) के रूप में संगठित होना चाहिये जो 'शरीर, मन तथा आत्मा'(body, mind & spint) को एकीकरण कर पाये।

कई प्रकार से अन्तर सिद्धारकारों में मतो में अन्तर देखने को मिलता है परन्तु इस बात पर सभी एकगत हैं कि लड़कियों की स्कूलिंग की सफलता लड़कों के अनुकरण से ही सम्भव हो सकती है। पुरुषत्व के गुणों (Masculine Values) को सार्वभौमिक मूल्यों (Universal Values) के रूप में अपनाने के बजाय स्कूलों को महिलाओं के संबंधपरक {relational values) मूल्यों को अपनाना चाहिये तथा इन्हें भी उतना ही महत्त्व देना चाहिये जितना कि पुरुषों से जुड़ी तार्किक मूल्यों को (relationalistic values)।

लिबरबल नारीवादियों को वामपंथी चुनौती

लिबरल नारीवादी या तो महिला से जुड़े मूल्यों को सराहते हैं या फिर पुरुषों के मूल्यों को सार्वभौमिक रूप दे देते हैं। जबकि वामपंथी स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व मूल्यों दोनों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि दोनों ही प्रकार के मूल्य सेकिस्जम, रेसिज्म, विषम लैंगिता, वर्ग पदानुक्रम तथा अन्य प्रकार की असमानता को बढ़ावा देते हैं। अन्य आमपंथियों के समान, संरचनावादी तथा विखंडनवादी (डीकंसट्रक्टिव) शिक्षाविद औपचारिक शिक्षा को, सामाजिक परिवर्तन की जगह नहीं मानते।

परन्तु वह स्कूलों को आलोचनात्मक पूछताछ (critical enquiry) तथा सामाजिक बदलाव (Transformer) के विकल्प उपलब्ध करने का स्थान मानते हैं। अतः संरचनावादी तथा डीकंसट्राक्टिव (विखंडन) उपचार द्वारा प्रभुत्ववादी संरचनाओं पर प्रश्न उठाकर, छात्रों की चेतनता बढ़ाई जाती हैं इससे उनमें दमनकारी प्रवृत्तियों तथा संबंधों के बारे में स्वयं के जेंडरीकृत सहभागिता के बारे में जागरुकता पैदा की जाती है।

Reflection and Refraction Of Light Numericals. प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन Numericals.

Reflection and Refraction Of Light Numericals. प्रकाश परावर्तन तथा अपवर्तन Numericals.
Reflection and Refraction Of Light Numericals.


प्रश्न 1. 32 cm फोकस दूरी के अवतल दर्पण के सामने एक वस्तु 16 cm दूरी पर रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात करो।

प्रश्न 2. 24 cm वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर्पण( concave mirror) के सामने एक वस्तु 6 cm दूरी पर रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात करें।

प्रश्न 3. किसी अवतल दर्पण( concave mirror) की वक्रता त्रिज्या 60 cm कोई वस्तु उस अवतल दर्पण( concave mirror) से 45 cm दूरी पर रखी है। दर्पण से वस्तु के प्रतिबिंब की दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 4. किसी उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 20 cm है। एक वस्तु को दर्पण के सामने कहाँ पर रखा जाए कि वस्तु के आधे आकार का प्रतिबिंब बनें?

प्रश्न 5. किसी अवतल दर्पण( concave mirror) के सामने उससे 20 cm की दूरी पर कोई वस्तु रखने पर उसका वास्तविक प्रतिबिंब दर्पण से 30 cm की दूरी पर बनता है। दर्पण की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 6. एक अवतल दर्पण(concave mirror) के सामने 10 cm दूर रखी वस्तु का वास्तविक प्रतिबिंब 30 cm दूर बनता है। दर्पण (Mirror)  की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 7. 20 cm फोकस दूरी के किसी अवतल दर्पण( concave mirror) के सामने एक वस्तु 30 cm की दूरी पर रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति क्या होगी?

प्रश्न 8. किसी अवतल दर्पण( concave mirror) की फोकस दूरी 10 cm है। यदि कोई वस्तु दर्पण से 20 cm की दूरी पर स्थित तो वस्तु का प्रतिबिंब दर्पण से कितनी दूर बनेगा?

प्रश्न 9. एक 3.0 cm लंबी वस्तु किसी 8.0 cm वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर्पण( concave mirror) के सामने 12 cm की दूरी पर मुख्य अक्ष के लंबवत् रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति, आकार व प्रकृति ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 10. एक व्यक्ति की ऊंचाई 1.68 m है। अपना पूरा प्रतिबिंब देखने के लिए उसे कम-से-कम कितने ऊँचे समतल दर्पण (Plane Mirror)  की आवश्यकता होगी?

प्रश्न 11. एक व्यक्ति समतल दर्पण (Plane Mirror) के सामने खड़ा है। यदि मनुष्य का प्रतिबिंब उससे 6 cm दूर बनता है, तो मनुष्य की दर्पण (Mirror)  से दूरी बताइए।

प्रश्न 12. 30 cm वक्रता त्रिज्या वाले किसी अवतल दर्पण की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 13. किसी उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 10 cm है। एक वस्तु इसकी मुख्य अक्ष पर धुव से 20 cm की दूरी पर रखी जाती है। वस्तु के प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए। क्या वह वास्तविक होगा?

प्रश्न 14. किसी उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 10 cm है। एक वस्तु को उत्तल दर्पण के सम्मुख कहाँ रखा जाए कि वस्तु के आधे आकार का प्रतिबिंब बने?

प्रश्न 15. एक अवतल दर्पण ( concave mirror) के सामने 5 cm की दूरी पर रखी वस्तु का वास्तविक प्रतिबिंब 15 cm दूर बनता है। दर्पण की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 16. एक अवतल दर्पण( concave mirror) से जिसकी फोकस दूरी 25 cm है, कितनी दूरी पर एक वस्तु रखी जाए जिससे कि प्रतिबिंब का आकार वस्तु के आकार के बराबर हो? इसके लिए किरण आरेख भी खींचिए।

प्रश्न 17. एक अवतल दर्पण(Concave Mirror) की फोकस दूरी 5 cm है। इसके सामने 10 cm की दूरी पर रखी वस्तु का प्रतिबिंब कहाँ पर बनेगा? क्या यह वास्तविक होगा?

प्रश्न 18. एक अवतल दर्पण ( concave mirror) से 30 cm दूर रखी वस्तु का तीन गुना बड़ा (a) आभासी (b) वास्तविक प्रतिबिंब प्राप्त होता है। प्रत्येक दशा में अवतल दर्पण की फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 19. किसी अवतल दर्पण ( concave mirror) की वक्रता त्रिज्या 40 cm है। किसी वस्तु को दर्पण से कितनी दूरी पर रखा जाए कि उसका दो गुना आकार का प्रतिबिंब बने?

प्रश्न 20. 20 सेमी वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर्पण ( concave mirror) के सामने 5 cm की दूरी पर एक मोमबत्ती जलाई जाती है। मोमबत्ती का इस स्थिति में प्रतिबिंब कहाँ पर बनेगा?

प्रश्न 21. एक अवतल दर्पण ( concave mirror) की वक्रता त्रिज्या 120 cm है। 4 सेमी लंबी वस्तु दर्पण से 90 cm दूर रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति, लंबाई व प्रकृति ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 22. किसी 30 cm फोकस दूरी वाले अवतल दर्पण ( concave mirror) से कितनी दूरी पर एक वस्तु रखी जाए कि उसका 5 गुना बड़ा प्रतिबिंब बने, जबकि प्रतिबिंब

(a) वास्तविक हो, (b) आभासी हो? प्रतिबिंब की स्थिति भी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 23. एक अवतल दर्पण ( concave mirror) की वक्रता त्रिज्या 60 cm है। 4 cm लंबी वस्तु दर्पण से 45 cm की दूरी पर रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति, लंबाई व प्रकृति ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 24. एक अवतल दर्पण (concave mirror) की फोकस दूरी 15 cm है। 25 cm की दूरी पर रखी वस्तु के प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 25. किसी अवतल दर्पण( concave mirror) वक्रता त्रिज्या 40 cm है। उस दर्पण से 30 cm दूरी पर रखी वस्तु के प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 26. 20 cm वक्रता त्रिज्या वाले एक अवतल दर्पण ( concave mirror) के सामने (a) 5 cm की दूरी पर, (b) 15 cm की दूरी पर एक मोमबत्ती रखी जाती है। प्रत्येक स्थिति में प्रतिबिंब कहाँ-कहाँ बनेंगे?

प्रश्न 27. एक अवतल दर्पण( concave mirror) की वक्रता त्रिज्या 20 cm है। किसी वस्तु को दर्पण से कितनी दूर रखा जाए कि उसका दोगुने आकार का वास्तविक प्रतिबिंब बनें?

प्रश्न 28. 60 cm वक्रता त्रिज्या वाले किसी दर्पण (Mirror) के सामने 30 cm की दूरी पर रखी गई वस्तु का प्रतिबिंब कहाँ बनेगा और कैसा बनेगा? यदि दर्पण अवतल होगा, तो प्रतिबिंब कहाँ बनेगा?

प्रश्न 29. किसी  30 cm फोकस दूरी वाले किसी अवतल दर्पण( concave mirror) के सामने कोई वस्तु कितनी दूरी पर रखी जाए कि उसका वास्तविक प्रतिबिंब वस्तु से आकार में दोगुना हो?

प्रश्न 30. 10 cm फोकस दूरी के अवतल दर्पण ( concave mirror) के सामने मुख्य अक्ष पर दर्पण के धुव से 15 cm की दूरी पर 3.0 cm ऊँची मोमबत्ती रखी है। प्रतिबिंब की स्थिति एवं उसका आकार ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 31. एक उत्तल दर्पण के सामने 40 cm की दूरी पर बिंदु प्रकाश स्रोत रखा जाता है। दर्पण की फोकस दूरी 40 cm है। प्रतिबिंब की स्थिति ज्ञात कीजिए। आरेख भी खींचिए।

प्रश्न 32. 30 सेमी वक्रता त्रिज्या वाले अवतल दर्पण से 20 सेमी की दूरी पर वस्तु रखी है। प्रतिबिम्ब की स्थिति एवं प्रकार बताइए।

प्रश्न 33. 3 सेमी ऊँचे एक बिम्ब को 20 सेमी फोकस दूरी के एक अवतल दर्पण के सामने 10 सेमी की दूरी पर रखा गया है। बने प्रतिबिम्ब की स्थिति, प्रकृति तथा आकार ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 34. एक उत्तल लेन्स की फोकस दूरी 30 सेमी है। परिकलन कीजिए कि इस लेन्स से कितनी दूरी पर बिम्ब को रखें कि उसका प्रतिबिम्ब लेन्स के पार 60 सेमी की दूरी पर बने? लेन्स द्वारा उत्पन्न आवर्धन का मान ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 35. एक 5 सेमी लम्बी वस्तु, 20 सेमी फोकस दूरी वाले उत्तल लेन्स के मुख्य अक्ष के लम्बवत् रखी गई है। लेन्स से वस्तु की दूरी 30 सेमी है । इसके प्रतिबिम्ब की (i) स्थिति, (ii) प्रकृति तथा (iii) आकार ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 36. 3.0 सेमी ऊँचाई की कोई वस्तु, 15.0 सेमी फोकस दूरी के अवतल लेन्स के मुख्य अक्ष के लम्बवत् रखी गई है। वस्तु का प्रतिबिम्ब लेन्स से 10.0 सेमी की दूरी पर बनता है।

(i) वस्तु की लेन्स से दूरी तथा

(ii) प्रतिबिम्ब की प्रकृति एवं आकार परिकलित कीजिए।

प्रश्न 37. दो पतले लेन्स जिनकी क्षमताएँ +3.5 डायोप्टर तथा -2.5 डायोप्टर हैं, एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं। इस लेन्स संयोजन की क्षमता तथा फोकस दूरी ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 38. प्रकाश वायु से 1.33 अपवर्तनांक वाले जल में प्रवेश करता है। जल में प्रकाश की चाल की गणना कीजिए। वायु में प्रकाश की चाल 3x10⁸ मीटर/सेकण्ड है।

प्रश्न 39. वायु के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक 1.50 है तथा काँच के सापेक्ष हीरे का अपवर्तनांक 1.61 है। वायु के सापेक्ष हीरे का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 40. यदि वायु के सापेक्ष किसी पारदर्शी द्रव का अपवर्तनांक 1.25 है तथा काँच का अपवर्तनांक 1.5 है, तो द्रव के सापेक्ष काँच के अपवर्तनांक की गणना कीजिए।

प्रश्न 41. निवांत में प्रकाश की चाल 3x10⁸ मीटर/सेकंड है। यदि काँच का अपवर्तनांक 3 हो, तो कांच में प्रकाश की चाल ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 42. किसी द्रव का वायु के सापेक्ष क्रांतिक कोण 45° है। वायु के सापेक्ष उस द्रव का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 43. काँच और वायु के क्रांतिक कोण का मान ज्ञात कीजिए। वायु के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक 1.5 है। (sin 42° = 0.67)

प्रश्न 44. एक वायु में प्रकाश की चाल 3x10⁸ मीटर/सेकंड है। उस माध्यम में प्रकाश की चाल ज्ञात कीजिए जिसका वायु के सापेक्ष अपवर्तनांक 1.5 है।

प्रश्न 45. वायु तथा काँच में प्रकाश की चालें क्रमश: 3x10⁸मीटर/सेकंड तथा 2x10⁸ मीटर/ सेकंड है। वायु के सापेक्ष काँच का अपवर्तनाक ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 46. एक झील को वास्तविक गहराई 2 मीटर है यदि वायु के सापेक्ष जल का अपवर्तनांक 4/3 हो तो ज्ञात कीजिए, कि झील की तली में रखी किसी छोटी वस्तु की आभासी गहराई क्या होगी तथा वह तली से कितनी ऊपर उठी हुई प्रतीत होगी?

प्रश्न 47. वायु के सापेक्ष जल तथा काँच के अपवर्तनांक क्रमश: 4/3 व 3/2 हैं। कांच का जल के सापेक्ष अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 48. निर्वात तथा किसी अन्य माध्यम में प्रकाश की चालें क्रमश: 3x10⁸ मीटर/सेकंड तथा 1.5x10⁸ मीटर/सेंकड है। माध्यम के निरपेक्ष अपर्वनांक की गणना कीजिए।

प्रश्न 49. एक प्रिज्म का कोण 60° अल्पतम विचलन कोण 30° है। प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 50. निर्वात में प्रकाश की चाल 3.0x10⁸ मीटर/सेकंड है। जल में प्रकाश की चाल की गणना कीजिए, जल का अपवर्तनांक 1.33 है।

प्रश्न 51. एक प्रिज्म का कोण 60° तथा अल्पतम विचलन कोण 38° है। प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए। (sin 49° = 0.75)